हमें तुम पर तुम्हें हम पर भरोसा ग़र नहीं होता,
कभी मानिंद ज़न्नत के हमारा घर नहीं होता।
अगरचे आदमी का दिल जो यूं पत्थर नहीं होता,
मुहब्बत का कोई खलिहान फिर बंज़र नहीं होता।
हदों पर ही हमेंशा हम अगर कायम रहे होते,
किसी भी हाथ में यूं आज ये ख़ंज़र नहीं होता।
सँभल जाते हमो-तुम ग़र ज़रा भी वक़्त से पहले,
तो फिर यूं ना-ग़वारा आज ये मंज़र नहीं होता।
ज़रा सा तुम समझ जाते ज़रा सा हम समझ जाते,
तो आंगन बीच में गाड़ा गया पत्थर नहीं होता।
गुजिश्ता दौर के हालात अब तक याद है मुझको,
कभी इतिहास से अच्छा कोई रहबर नहीं होता।
बहुत से ख़्वाब देखे हैं बहुत से घर बनाये हैं,
किसी में छत नहीं होती किसी में दर नहीं होता।
मुदावा चल नहीं सकता मरीज़-ए-इश्क़ का यारों
इलाज इस मर्ज़ का होता तो मैं शायर नहीं होता।
Tuesday, 3 February 2015
ग़ज़ल- २
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