सर्वत्र ही
तन्त्र बनाने की होड़ है,
सभी तन्त्रों का अपना तान्तत्रिक जौर है।
कहीं लेपटॉप,
कहीं कोई मन्त्र,
आखिर
कहाँ बचा है गणतन्त्र ?
अब गणतन्त्र
मात्र कुछ गणों का है,
तन्त्र में जौर
राजनैतिक स्वर्णों का है।
राजनैतिक स्वर्ण ही कर्ता-धर्ता है,
किसान-मजदूर
बैचारा मरता है।
दलितों को
अब भी दलित कहकर बुलाते है,
दलित-दलित कहते
साहानुभूति दर्शाते है।
वक्तव्यों में अपने,
पूरा जौर लगाते है,
चली न जाये साख,
सो भंवरी को जिन्दा जलाते है।
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