गोविन्द हरे, गोपाल हरे,
सर्वेश्वर दीनदयाल हरे।
ॠषियों के ॠषिपाल हरे,
हो भक्त बछल गोपाल हरे।।
तुम अंबर पर नीलवर्ण सम,
वटपातों के हरित पर्ण सम।
चहुँओर चराचर में बहने वाली
पवनों की चाल हरे।।
चारू चपला की चंचलता,
तुम सागर का नीर उफनता।
हम ढेरी कंकड़-पत्थर की,
तुम हो मुतियन की थाल हरे।।
तुम से क्या हम आज छुपाएँ ?
कल फिर क्या आकर बतलाएँ ?
हो आप अनुपम अगम अविगत,
हम हैं बालक फिलहाल हरे।।
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