Tuesday, 24 June 2014

मुक्तक

१.
कोमल कलियों से आबाद गुलिस्ताँ हो जाए,
अलि-अलि के मन का आल्हाद गुलिस्ताँ हो जाए।
रहे सजी फुलवारी इन रंगीले फूलों से,
और तमन्ना कि बे इनाद गुलिस्ताँ हो जाए।

२. (बाल विवाह)
खिले भी क्या अभी तो फूल ये प्यारे,
अदा क्यों कर रहे महशूल ये प्यारे।
कहो किस जुर्म का है दण्ड ये इनको,
नहीं लगते जहां के रूल ये प्यारे।

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