Tuesday, 15 July 2014

मुक्तक ३

खिल गया जो गुल कभी वो लब्ध-ए-मंजिल हुआ।
तोड़ के नाता कली से गर्द में शामिल हुआ।
चार दिन की जिन्दगी है बात ये समझें अगर,
क्या किया आकर यहाँ पर जो फकत बोझिल हुआ।

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