कविता, गजल एवं अन्य साहित्यिक रचनाएँ । नवसृजन
भीड़ में होकर खड़े हम तो दरख्ते-उजाड़ हो गए, मेहराब हुआ किये हम भी कभी अब किवाड़ हो गए। मेहरबानी से तेरी हमदम शबे-फुर्क़ते-इश्क मिला, अगन में जलके सनम दो-चार दिन का जुगाड़ हो गए।
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