Wednesday, 6 August 2014

मुक्तक- 5


भीड़ में होकर खड़े हम तो दरख्ते-उजाड़ हो गए,
मेहराब हुआ किये हम भी कभी अब किवाड़ हो गए।
मेहरबानी से तेरी हमदम शबे-फुर्क़ते-इश्क मिला,
अगन में जलके सनम दो-चार दिन का जुगाड़ हो गए।

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