सरसी छन्द ;-
परिचय- यह एक मात्रिक छन्द है। इसमें दो अथवा चार चरण हो सकते हैं। दो-दो चरणों की तुक मिलाई जाती है।
मात्रा विधान- प्रत्येक चरण में 27 मात्राएँ होती है। 16, 11 पर यति होती है। चरण के अन्त में गुरु-लघु(21) होना अनिवार्य है।
विशेष- चरण की पहली 16 मात्राएँ चौपाई के विधान पर होनी चाहिए तथा अन्तिम 11 मात्राएँ दोहे सम चरण के विधान पर होनी चाहिए।
---पहली 16 मात्राओं के अन्त गुरु-लघु न हो।
उदाहरण-( दिये जा रहे पद मेरे मौलिक नहीं हैं, इनका उपयोग महज़ उदाहरण के लिए किया गया है।)
अंशुमालि के शुभागमन की बेला समझ समीप।
नभ में बुझा चुके थे सुर भी अपने घर के दीप।
कल-रव सुमन-विकास संग ले निकली रवि की कोर।
क्षण भर पहले ही दो प्रेमी कहाँ गये, किस ओर।
दीवाली को समझो पहले, जानों इसका अर्थ ।
रहा कहीं भी तम तो होगा, पर्व मनाना व्यर्थ ।।
घर को साफ-सुघड़ रखने में, सभी दीखते दक्ष ।
मन का घर भी सुथरा करके, रखो हृदय को स्वच्छ ।।
एक ज्ञान का दीप जलाओ, जगत करो उजियार ।
एक दीप हो ऐसा जिसकी, लौ में झलके प्यार ।।
एक दीप हो स्नेह-राग का, ऐसा जले विशेष ।
जिसे देख कर ही जल जायें, ईर्ष्या घृणा व द्वेष ।।
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