Tuesday, 12 August 2014

मुक्तक 6

जमाने में मुहब्बत की न कोई चीज सानी है,
नियामत है मुहब्बत ख़ास आलिम की जुबानी है।
नजीरे-इश्क देखी है किताबों में हमो-तुमनें,
नहीं मरती मुहब्बत सिर्फ अपना जिस्म फानी है।

मुहब्बत के बिना अपनी अधूरी जिन्दगानी है,
यही कहता कबीरा और मीराँ की जुबानी है।
लिखा है सूर ने ऐसा यही तुलसी बयाँ करते,
मुहब्बत के बिना पर ही किताबे-आसमानी है।

कहीं मजनूँ दिवाना है कहीं लैला दिवानी है,
हरिक दीवार पर लिक्खी मुहब्बत की कहानी है।
खुदाई का मुहब्बत से बड़ा ही ख़ास नाता है,
मुहब्बत से खुदा राज़ी सभी ने बात मानी है।

यही परवाज़ का दम है बहारों की रवानी हैं,
दिवानों ने कहाँ मापा कि कितने हाथ पानी है।
मुख़ालिफ़ हार के बैठे इरादे चूर है सारे,
खिलादे आग में गुलशन मुहब्बत लोकवाणी है।

No comments:

Post a Comment