कविता, गजल एवं अन्य साहित्यिक रचनाएँ । नवसृजन
हाथों में बन्दूकें थामे अपना सीना तान चले, करने अपनी माँ की सेवा देखो वीर जवान चले। परवाह नहीं जख्मों की वो चाहे जितने गहरे हों, दावागीर खड़े दुश्मन की लेने को अब जान चले।
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