सुब्ह की शुरुआत से फिर शाम तक,
काम ही बस काम आठों याम तक।
आदमी चलता मशीनों की तरह,
रात-औ-दिन मौत के पैग़ाम तक।
चैन की ख़ातिर सभी बैचैन हैं,
खो दिया है नींद का आराम तक।
कर्ज़ में डूबा है कोई तो इस क़दर,
रख दिया गिरवी बदन-औ-चाम तक।
फासले अब इस क़दर हैं बढ़ गये,
याद उनको अब नहीं है नाम तक।
ख्वाब है तू देखता जिस जाम के,
ज़िन्दगी शायद रहे उस जाम तक।
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