Tuesday, 14 October 2014

ख्वाब के जैसी हमारी ज़िन्दगी है

ख्वाब के जैसी हमारी ज़िन्दगी है,
गर्दिशे-जद पर हमेंशा ही खड़ी है।

दह्र सा गुलशन कभी थर्रा गया था,
आदमी तो एक अदना सी कली है।

कुछ भलाई हो सकें तो कर चलें अब,
उम्र भर की मोहलत हमको मिली है।

बेवजह ही ज़िन्दगी औ' मौत गर हो,
यार ये ही तो जहाँ में मुफ़लिसी है।

छोड़ के परदेश आजा लौट के अब,
देश में आख़िर कमी किस बात की है।

होश में आजा ज़रा मग़रूर अब तू,
चंद लम्हों का नशा औ' बे ख़ुदी है।

शिर्क से बेदार नीरद चल सफ़र में,
उम्र का हर एक लम्हा आखरी है।

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