Thursday, 6 November 2014

आदमी अब आदमी से दूर होता जा रहा

आदमी अब आदमी से दूर होता जा रहा,
क्या पता ये किस नशे में चूर होता जा रहा।

बढ़ रही अश्लीलताएं फैशनों के नाम पर,
सब ख़जाने लुट रहें हैं हुस्न वाले जाम पर।
नूर की खातिर बड़ा बे नूर होता जा रहा,
आदमी अब आदमी से दूर होता जा रहा।

भ्रष्ट सा आचार है औ' बू नहीं ईमान की,
खो गई तस्वीर जाने अब कहाँ इंसान की,
रश्क से धूमिल ये मिस्ले-तूर होता जा रहा,
आदमी अब आदमी से दूर होता जा रहा।

बन गई है जीभ ख़ंज़र बोल तीखे बोलती,
प्रेम के सम्बन्ध को भी द्वेष से है तोलती।
बेवजह के रंज से रंजूर होता जा रहा,
आदमी अब आदमी से दूर होता जा रहा।

कोहरा छाया हुआ है देखता हूँ जिस तरफ,
लग रहा है क़हर जैसे आ रहा है इस तरफ।
दौर में बदलाव अब मंज़ूर होता जा रहा,
आदमी अब आदमी से दूर होता जा रहा।

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