Wednesday, 19 November 2014

फिर जगाने आ गया

सोये हुये सारे जहां को फिर जगाने आ गया,
खोये हुये हर शख़्स को रस्ता दिखाने आ गया।

झिलमिल सितारों ने सजाया आसमां को रात में,
ये मखमली सी धूप ले धरती सजाने आ गया।

जो ख़्वाब आँखों ने सँजोये रात भर सोते हुये,
देकर हक़ीक़त की ज़मीं पैरों चलाने आ गया।

काली सियाही रात थी खामोशियाँ चारों तरफ़,
सूनसान गलियों को नईं रौनक दिलाने आ गया।

कल का गुजारा जैसे-तैसे हो गया था शुक्र है,
कुछ निर्धनों की आज फिर चिंता बढ़ाने आ गया।

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