Friday, 29 August 2014

है देश की हालत बड़ी नाजुक सुधरनी चाहिए


है देश की हालत बड़ी नाजुक सुधरनी चाहिए,
हर खेत के नजदीक से गंगा गुजरनी चाहिए।

फ़िरदौस ले आना ज़मीं पर काम यह आसां नहीं,
फिर भी मगर यारों हमें कोशिश तो करनी चाहिए।

दौलत मयस्सर है जिन्हें जीते सुकूँ से जिन्दगी,
डूबी हुई कश्ती-ए-मुफलिस भी उभरनी चाहिए।

इस दौर की है ख़ासियत बिलकुल ठहरता ही नहीं,
कुछ पल मगर शाम-ए-सुकूँ बेशक ठहरनी चाहिए।

बढ़ने लगी है रंजिशें सारे जहाँ में दिन-ब-दिन,
गुलशन मुहब्बत का खिले खुशबू बिखरनी चाहिए।

कुछ लोग हैं जिनके इरादा-औ-नज़र नापाक है,
कुछ भी करें इनकी खुमारी तो उतरनी चाहिए।

मक़सद मेरा केवल नहीं है बह्र पर लिखना ग़ज़ल,
आयास है पूरी कि अब हालत सुधरनी चाहिए।

'नीरद' नहीं इफ़रात है केवल गरजना ही यहाँ,
जज़्बे सहित हमको नई शुरुआत करनी चाहिए।

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