पावन भी मनभावन भी यह राखी का त्यौंहार।
अगणित खुशियाँ भर झोली में आती बहना द्वार।।
हँसी-खुशी के रसगुल्लों की होती फिर बरसात।
भगिनी-भ्राता भर-भर बाँटे प्रेम सहित सौगात।।
सावन सा झिरमिर-झिरमिर फिर बरसे नेह अपार।
हिल-मिल नाचे गाए सारे सोहन राग मल्हार।।
घेवर और गुलगुलों से है सजता भोजन थाल।
प्रांगण फागण सा रंगीला हो जाता खुशहाल।।
राखी का यह बन्धन केवल नहीं सूत की डोर।
माने तो बसती है इसमें बहन हृदय की कोर।।
सह सम्मान मनाएँ मिलकर सारा घर-परिवार।
बहनो-भाई के रिश्ते में आए नहीं दरार।।
बहनें भी बढ़-चढ़कर आएँ पाएँ उत्तम स्थान।
उच्च पदों पर काबिज हों फिर करे विश्व सम्मान।।
नहीं भानुजा-बन्धु में किसी प्रकार कोई फर्क।
एक-समान समझिये दोनों छोड़ो तर्क-वितर्क।।
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