जिन्दगी रोज़ है कुछ सिखाती हमें,
हौंसले बढ़ रहे हैं सफ़र-दर-सफ़र।
खूब जिनसे रही यार नफ़रत हमें,
आशना हो गये हैं सफ़र-दर-सफ़र।
उम्र भर खीजते-छीजते ही रहे,
मर्ज़ सारे मिटे हैं सफ़र-दर-सफ़र।
अजनबी कुछ मिले थे सफ़र में हमें,
ख़ास वो हो गये हैं सफ़र-दर-सफ़र।
एक ही रोज़ में पेड़ फलते नहीं,
ये मुकम्मल हुये हैं सफ़र-दर-सफ़र।
गमज़दा है जहाँ में हरिक आदमी,
जानने हम लगे हैं सफ़र-दर-सफ़र।
आशनायी जहां से बता किस लिये?
ख़ाक में सब मिले हैं सफ़र-दर-सफ़र।
No comments:
Post a Comment