फासले इस क़दर दरमियाँ हो गए,
आज़ माँ-बाप भी मेहमाँ हो गए।
खून से जो रहे सींचते उम्र भर,
दरकिनार आज़ वो बागबाँ हो गए।
दायरे-दिल में जिनका मकाँ था कभी,
यार कूचा-ए-दिल से रवाँ हो गए।
देश के वास्ते कर गए जां फ़िदा,
आज बे क़द्र नामो-निशाँ हो गए।
दास्तां हम सुनायें किसे अब यहाँ,
लोग बहरे सभी अब यहाँ हो गए।
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